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रविवार, 4 अगस्त 2024

कृतघ्न अयोध्यावासी

 लानत है तुम्हें मूर्ख और कृतघ्न अयोध्यावासियो !

कई युगों से जुल्म सहे,न अपना धर्म बचा पाए ।
डर और लालच से वशीभूत होकर पहले मुगलों ,
फिर दुष्ट राजनेताओं के झांसे में तुम आ गए ।
बनाया काशी विश्वनाथ ,और श्री राम जन्म भूमि ,
फिर कृष्ण जन्म भूमि ,ज्ञान वापी का निर्माण होना था ,
उस सच्चे हिन्दू सनातनी ने जाने क्या क्या सोचा था,
मगर तुम उसकी श्रद्धा और मंशा न समझ पाए ।
भूल गए थे तुम शायद वही हो न ! अभिशप्त जनता,
जिसने माता सीता पर भी घृणित आक्षेप लगाए।
कुछ तो शर्म करो ! कुछ तो मन को अपने टटोलो,
तुम तो पहले ही अब तक देवी के श्राप से उबर ना पाए।
और अब तुमने सनातन धर्म की रक्षा करने वाले को ,
अपना एक छोटा सा मत दिया ,ना साथ खड़े हो पाए ।
तुम खुद को हिंदू कहते तो  हो , मगर तुम हिंदू नहीं हो
जातियों में बंट गए ,कब तुम एक हो पाए ।
तुम्हें फिर भी उसने  एक करने की कोशिश की ,
मगर  तुम निर्बुध्धि थे ,वही रहोगे , यही तुमने अपने आचरण दिखाए ।

रविवार, 30 जनवरी 2022

भारतीय फिल्म जगत कहां है ?

 


जब तक था यह भारतीय फिल्म जगत,
पूर्ण स्वदेशी और प्यारा सा लघु भारत ।

देशभक्ति भावना परिपूर्ण की गंगा बहती ,
और सर्वधर्म समभाव / मनुष्यता से युक्त ।

समाज सुधार की निर्मल भावना व् उद्देश्य ,
फिल्म निर्माण एवं गीत संगीत में निहित ।

मधुरता एवं पवित्रता का सुन्दर संयोजन,
देश तो क्या दीवाना होता था सारा जगत ।

जन्म दाता थे इसके महान दादा फालके जी ,
बड़े कठिन परिश्रम से किया था इसे स्थापित ।

मगर अब यह वो फिल्म जगत नही रहा ,
देखकर उनकी आत्मा होती होगी आहत ।

क्योंकि अब यह बन गया बॉलीवुड नापाक,
गुंडागर्दी ,गैंगस्टर ,कातिलों से भरा पंक।

देशद्रोह ,अश्लीलता ,हिंसा ,गाली गलोच ,
और भी अनेक जघन्य अपराधों का जनक।

देश और समाज को बर्बाद कर रहा है इसका ,
अमानुषिक ,अमानवीय कर्म अति घृणित।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता का उपहास करे ,
हमारे अतिपूजनीय गुरुजन,देशभक्तों ,देव पुरुषों ,
को करते यह अपमानित ।

हमारे देश के नाम कलंक ये पूर्ण नाश न कर दे ,
मानवता और सर्व धर्म समभाव करो आरक्षित ।

इस बॉलीवुड को करो पुनः राष्ट्रीय करण तुरंत ,
बनाने को सुन्दर भारतीय फिल्म जगत ।





शनिवार, 21 अगस्त 2021

हिंदुओं जाग जाओ !!

 






  आदरणीय प्रधान मंत्री जी की ,                                   अगुआई में अयोध्या हुई पूर्णतः हमारी ।                               इसके लिए उनका कोटि कोटि धन्यवाद । 

  

अयोध्या हमारी हुई तो उन्होंने ,                                              श्री राम जन्मभूमि मन्दिर का निर्माण करवाया।                उनका यह महान कार्य सदा रहेगा याद ।


अब कुछ ऐसी शिक्षा शुरू हो ,
जो धर्म शास्त्रो,वेद पुराणों आदि का ज्ञान दे ।
जो रामायण और महाभारत भी पढ़ाए ,
ऐसे विद्यालय खुलवा दें जहां पढ़ाई जाए विषारद ।

अपनी संस्कृति ,शिष्टाचार ,मानवीय मूल्यों का ज्ञान,
अपनी भाषा हिंदी और संस्कृत का ज्ञान ,
अति आवश्यक है हिंदू नई पीढ़ी को ।
नहीं जानते जो अपने मूल को अपितु करते है विवाद ।

सभी धर्म के अनुयायी करते है प्रचार प्रसार ,
अपने धर्म संबंधी ज्ञान ,पुस्तकों और आचरण का ।
बचपन से घुट्टी के रूप में मिलती है उनको ,
धर्म संबंधी सारी शिक्षा।
एक मात्र हिंदू धर्म क्यों बना रहे अपवाद ।

हमारे हिंदू धर्म में हमारी नई पीढ़ी को ,
यूं तो सारे विश्व भर का ज्ञान है।
देश और दुनिया की आर्थिक ,सामाजिक ,राजनीतिक
स्थितियों का ज्ञान है ।
दुनिया भर का फिल्मी ज्ञान है ।
बस अपने धर्म संबंधी ज्ञान नही है।
कौन इन्हें समझाए और कौन करे खुल के संवाद ।

शेष धर्म के लोग स्वयं और अपने बच्चों को ,
लेकर जाते है प्रतिदिन मस्जिद और गिरिजाघर।
परंतु हम स्वयं तो कभी कभी परंतु हमारे
बच्चों को नही लेकर जाते मंदिर ।
हमारे बच्चों को तो अपने देवी देवताओं के बारे में ,
ना ज्ञान है ना रुचि ।
अपितु पंडितों साधु संतो ,गुरुओं का करते हैं अपमान।
हम इन्हें समझाने से भी कतराते है की फिर
घर में होगा व्यर्थ में वाद विवाद ।

ऐसा कैसा चलेगा?
ऐसे तो हमारा हिंदू धर्म संकट में पड़ जायेगा ।
यदि नहीं होंगे एकजुट ,
और न ही जोड़ेंगे अपने बच्चों को हिंदू धर्म से,
तो हमारा धर्म नष्ट हो जायेगा.
और हमारा भारत वर्ष ,जो कभी कहलाता था,
आर्यव्रत ।वो परिवर्तित होकर जाने क्या बन जायेगा ।

गुरुवार, 12 अगस्त 2021

प्रतियोगिताओं का सच


 

  ये प्रतियोगिताओं का कैसा रिवाज चल रहा है , 

जो इनामात का लालच देकर लोगों को छलता है।


व्यवसायिक चैनलों में कभी संगीत तो कभी नृत्य ,
बड़ी आकर्षक सजावट लिए मंच लोगो को लुभाता है।

अति लोकप्रिय कला शिरोमणि न्यायधीश के रूप में, 
कुछ दिग्गज कलाकारों को न्योता दिया जाता है।


प्रतियोगियों की कला को मंत्रमुग्ध हो देख सुन कर ,
फिर उनके भाग्य का फैंसला किया जाता है।


दूध में से मलाई की तरह हर प्रतियोगी को छांट कर ,
शेष को पानी समझकर बाहर फेंक दिया जाता है ।

जो जीत गए वो तो भाग्य पर अपने नाज़ करते है ,
मगर जो हार गया वो आंसुओं से दामन भिगोता  है।

कितना दुखदाई होता है अस्वीकृति का वो लम्हा ,
यह तो उसे ही पता होता है जो अपमान सहता  है।

ऐसा ही मापदंड हर प्रतियोगिताओं का होता है,
साहित्य हो या शिक्षा,खेल संबंधी सबमें चलता है।

भाग्य आजमाने कई प्रतियोगी इसमें भाग लेते है ,
अपनी तरफ से हर कोई जी तोड़कर मेहनत करता  है ।

कहने भर को लोग कह देते है यह तो खेल है भाई !
हार और जीत तो जीवन में सदा चलता ही रहता है।

मगर भरोसा कैसे करें इन निर्णायको की नियत का ,
भेदभाव और कपट इनकी फितरत में शामिल होता  है।


  बेहतर होगा इन प्रतियोगिताओं से दूर रहा जाए,
  इनामात के मोह जाल से भी दूर रहा जाए,
ये ख्वाबों को पूरा करने के एवज में तुम्हारा  आत्म 
विश्वास और साहस आपसे  छीन लेता  है।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

मीडिया बिकता है बोलो खरीदोगे



 मीडिया बिकता है बोलो खरीदोगे ,

यहां हर चीज बिकती है दाम जो तुम बोलोगे ।


एक से एक बढ़कर खबरिया चैनलों की बहार है ,
सुन्दर दुकानों से सजे , बोलो तुम किसको देखोगे ?

सुंदर आकर्षक अभिनेता / अभिनेत्री समान ,
समाचार वाचक / वाचिकायों के अभिनय से मोहित ,
हो जाओगे ।

ऐसा प्रभावशाली अभिनय और तेज तर्रार वाणी ,
भाषाओं के जादूगर है तुम इनके कायल हो जाओगे ।

बॉलीवुड की गर्मागर्म खबरें हो या राजनीतिक दलों की लड़ाई ।
मिर्च मसाला लगाकर परोसेंगे, बहुत मजे से सुनोगे।

प्राकृतिक आपदा ,आर्थिक संकट , पड़ोसी शत्रुओं का
आक्रमण ,महामारी या और कोई समस्या।
राई का पहाड़ बनाकर खड़ा कर देंगे , तुम विश्वास कर लोगे ।

इनकी तमाम खबरे होती है आधी हकीकत आधा फसाना ।तुम विश्वास न भी करो मगर लपेटे में आ जाओगे ।

अपराधिक खबरों को यह खुल कर बयान हैं करते ,
शोषितों और पीड़ितों के दुख देखकर दो आंसू बहाकर ,यह तुम्हारी सहानुभूति एकत्र कर लेंगे ।
अपनी भावनाओं का क्या मोल लगवाओगे ?

यह तो सब व्यापारी है ,व्यापार करेंगे ।
अपनी टीआरपी बढ़ाने को हर संभव प्रयास करेंगे ।
फैला हुआ है जिस प्रकार इनका चक्र व्यूह ,
क्या उनसे निकल पाओगे ?















शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

बोलो प्रभु ! कौन हूँ मैं ? (कविता)

बोलो प्रभु !बोलो ! तुम्हें आज  बोलना होगा ,

कौन हूँ मै ? इस सवाल का जवाब देना होगा ।

मै औरत हूँ जगतजननी , शक्तिस्वरूपा अगर ,

क्योंकर बनाया मुझे भोग्या इस आदमी ने ?

मै इंसान हूँ एक जीती जागती ,ब्याँ करना होगा ।

मेरे सपने ,मेरे अरमान और मेरी खवाइशें ,

क्या कोई मायने रखते हैं तुम्हारे लिए ?

करते हो गर तुम स्वीकार तो इसे इस आदमी को भी

तुम्हें समझाना होगा ।

अहंकारी है जो , दंभी , वहशी , स्वार्थी ,कामुक पशु , दरिंदा ,

नहीं बर्दाश्त होता जिसे औरत का  आगे बढ़ना ,

नहीं रास आती उसकी चहुंमुखी तरक्की ,

जान जलती है उसकी ,

पृरुष अहम को ठेस जो लगती है उसके ,

इसीलिए रोकना चाहता है मेरा मार्ग इस तरह से ।

ईर्ष्यावश !! कुंठित होकर ,

मुझे खिलौना समझकर , मुझे प्रताड़ित कर,

कभी घर में कैद कर और कभी मेरा मान -मर्दन कर ,

मेरा आत्म-सम्मान , मेरी जिंदगी और मेरी आबरू को

समाप्त कर क्या साबित करना चाहता है? ,

तुझे समझना होगा।

अगर मै हूँ तेरी सर्व श्रेष्ठ रचना ,

है मुझमें तेरा ही अंश ,आत्म तत्व ,

तो मेरे लिए , मात्र मेरे लिए ,बस एक बार!  फिर !

धरती पर आना होगा ।

मेरे सवालों का जवाब देने हेतु तुझे एक बार तो सामने

आना ही होगा ।

आखिर कौन हूँ मै?  अब तुम्हें इस  पुरुष जगत को ,

अपनी विधि से , चाहे जैसे भी समझना होगा ।

मै नारी रूप में माँ, बहन, बीवी हूँ और बेटी भी ,

मैने हर रूप में अपना सारा जीवन दिया ,

इस पुरुष को सेवा दी, ममता दी, चाहत दी,

स्नेह दिया और अपना भोला मासूम बचपन भी ।

मगर इस कमजर्फ ,एहसान फरामोश आदमी ने मुझे क्या दिया ?

मुझे समझा केवल मांस का टुकड़ा !!

तुम क्यों अब तक इस घोर अन्याय ,अनाचार , पशुता पर भी

खामोश हो ?

बोलो प्रभु !  बोलो ! तुम्हें शीघ्र अति शीघ्र बोलना ही होगा ।

मेरे अस्तित्व पर  मंडरा रहा है खतरा ,

तुम्हें मेरा सरंक्षण करना होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दर्द भरी मुस्कान (गजल)

 

यूं तो है उसके लबों पर मुस्कान ज़रा-ज़रा ,

मगर दिल तो है दर्द से पुरजोर भरा -भरा ।

यह दिखावा इसीलिए भी ज़रूरी जहां के लिए ,

मरहम नहीं!लोगों के पास नमक है ज़रा-ज़रा ।

इक सज़ा की मानिंद जी रहा है वो जिंदगी ,

इंसान है वो कई आज़ारों से भरा- भरा ।

तक़दीर से रूठा हुआ और खुदा से भी खफा ,

है दुनिया की रंगिनियों से बेज़ार ज़रा-ज़रा ।

हर सु बेचैनी च्ंकि सुकून है उससे कोसो दूर ,

ख्वाइशों के तराजू में उम्र को पाया ज़रा-ज़रा ।

अब ऐसे में अपने ख्वाबों की ताबीर कैसे हो ‘अनु’ ,

जब रूह से क़ज़ा की दूरी है बस ज़रा-ज़रा ।

 

 

 

 

वो कौमी एकता कहाँ गयी ( गजल )

 

हिन्दू -मुस्लिम ,सिख -ईसाई ,

आपस में थे कभी भाई-भाई ।

भाई -भाई से जुदा हो गया अब,

यह खाई किसने दरम्यान बनाई ?

एक दूजे के दिल में नफरत की आग ,

आखिर किसने और क्यों भड़काई ?

एक दूजे के मजहब को मान देते थेजो ,

उनमें बैर की तहजीब कहाँ से आई ?

एक दूजे के परिवार को संभालते थे वो,

जब भी उनपर कभी बुरी घड़ी आई ।

अब बने हैं एक दूजे की जान के दुश्मन ,

हाँ !कभी  थे हमदम ,हमराज़ ,हमराही ।

इन नादानों ने तो भगवान को भी बाँट दिया ,

मंज़िल जब एक है तो इतनी राहें कैसे बन आई ?

अरे दिवानों ! महज अपने मतलब के लिए ही ,

इन सियासतदारों ने तुम्हारे बीच दीवार बनाई ।

अब न समझोगे तो कब तलक समझोगे तुम ,

आखिर बरसों पुरानी कौमी एकता कहाँ खोगई ?

वतन पूछता है तुमसे , किसके बहकावे में आकार ,

मेरी गंगो-जमुनी तहजीब की आन तुमने मिटाई ?

मेरे घर के चिरागो! ,मत लड़ो आपस में,अमन से रहो ,

नफरत की आग नहीं,मुझे चाहिए प्यार की रोशनाई ।

करोना का खौफ (गजल)

 

सुनी है जो उनके आने की आहट हमने ,

अपना सारा होशो-हवास गंवाया हमने।

पहले भी सजग थे साफ सफाई को लेकर ,

और अब नया वहम का रोग लगाया हमने।

अपनों से गले लगना,हाथ मिलाना हुआ बंद ,

और अब दूर से सलाम का चलन बनाया हमने ।

अपने ही घर जबसे नज़रबंद होकर रह गए हम ,

इस तरह देखिये खुद को ही कैदी बनाया हमने ।

हमें तो अपना पालतू सर्दी-जुकाम भी दुश्मन लगे ,

कोरोना के डर से अपना बदहाल बनाया हमने ।

अब तो ये आलम है की हर शय वायरस ही दिखे ,

ऐसे दीवाने हम न थे ,खुद को दीवाना बनाया हमने ।

 

 

 

 


हाय रे मजदूर जीवन (कविता)

 हाय रे मजदूर जीवन ,तेरी यही कहानी ,
भूखा प्यासा तन और आँखों में है पानी ।
विकास का पहिया चले देश का तेरे दम पर ,
इस भाग्य विधाता की किसी क्द्र न जानी ।
अपना सबकुछ होम कर जो करते मेहनत ,
परंतु पूरा वेतन देने में मालिक करे आनाकानी ।
कोई पूछे तो इनके दिल से कैसे गुज़र होता है? ,
बड़ी मुश्किल है महानगरों में जिंदगी निभानी ।
महंगाई के इस युग में क्या पहले कम दुखी थे !
उस पर महामारी ने आकर शुरुकर दी पैठ जमानी ।
गाँव से तो आए थे स्वजनो को छोडकर धन कमाने ,
मगर जब जीवन चर्या नहीं तो बेहतर है जान गंवानी ।
मरण तो लिखा ही है मजदूर संग घर मरे या सड़क पर ,
ऐसे में इनकी नज़र में महामारी से बचना है बड़ी नादानी ।
सरकार की योजनाए / सुविधाएं सारी किसके लिए है ?
विश्वास -अविश्वास के चक्रव्यूह में फंसी पूरी कहानी ।
यह कोई दो दलों की राजनीति है या कोई षड्यंत्र रचा हुआ ,
जिनके पाटन के बीच पिस रही है मजदूरों की ज़िंदगानी ।
भाग्य विधाता होकर भी देश का जो है भाग्य हीन ,लाचार,
ऐसे असहाये मजदूर जीवन को देखकर आ जाता है आँखों में पानी।

संवेदनाओं पर तुम्हारा ही अधिकार क्यों ?

 हे मनुष्य !
माना की हम पशु हैं,
परंतु है तो प्राणी ।
प्राण हम में भी बस्ते हैं।
सुख-दुख ,हर्ष -विषाद ,
पीड़ा -आनंद आदि हमारे
जीवन के भी अंग हैं।
भाग्य – दुर्भाग्य हमारे भी
जीवन के साथ ही जुड़ा है।
मान-अपमान को हम भी
महसूस करते हैं।
हम में भी होती है, ममता,प्रेम ,करुणा ,
दया , सहयोग ,जितनी की तुममें ।
अपितु तुम से अधिक ।
तुमने तो यह  सभी अमूल्य निधि खो दी है,
जो तुम्हें मानव बनती थी।
मगर तुम तो हम से भी नीचे गिर गए।
तुमने जो निधि खोयी ,
हमने अब तक सँजो के रखी हुई है,
पशु होकर भी।
हम तो पशु होकर भी कभी पशुता पर नहीं उतरे ।
और तुम मानव होकर मानवता ही भूल गए।
तब भी तुम्हारा इन संवेदनाओं पर अधिकार है  क्यों ?
मात्र इसीलिए ! की तुम सर्वाधिक शक्तिशाली ,बुद्धिशाली
विकसित प्राणी ,इस धरती पर ।
और हम तुमसे निम्न बुद्धि ,निर्बल, मुक ,
अविकसित प्राणी इस धरती पर।
मगर न्यून सही बुद्धि तो है हमारे पास,
तुम्हारे जितना विशाल न सही ,
ह्रदय भी है हमारे पास ।
फिर संवेदनाओं पर केवल तुम्हारा ही एकाधिकार कैसे ?
हमारा समाज भले ही तुम्हारे समाज जैसा विस्तृत और विकसित न हो ,
मगर हमारे समाज में भी एक परिवार होता है,
माँ -पिता ,भाई-बंधु ,सभी होते हैं तुम्हारी तरह ।
मगर तुम्हारे रिश्ते स्वार्थ से बंधे होते हैं, हमारे नहीं।
एक इंसानी माँ की भावनाओं ,और एक पशु माँ की भावनाओं में,
क्या अंतर होता है?
एक इंसानी शिशु , बच्चों की बालसुलभ चंचलता ,हठ में कोई
अंतर होता है क्या ?
वास्तव में हम में  और तुम में कोई अंतर नहीं।
रुधिर तुम्हारे तरह हमारे रगों में भी बहता है।
नयन हमारे भी अश्रु बहाना जानते है।
बेजुबान ही सही ,भावनाओं की भाषा तुमसे अधिक समझते हैं।
चोट ,घाव ,जलन , तपन ,हम भी महसूस करते हैं।
स्नेह का स्पर्श भी महसूस करते हैं।
मगर अफसोस ! तुम्हारे छ्ल ,प्रपंच को हम नहीं समझते ।
यह मानवीय गुण हम में नहीं है।
बस इसी गुण से हम तुमसे पिछड़ गए।
अगर यह गुण हमारे में भी होते तो हम कभी तुमसे न हारते ,
और ना ही धोखा खाते ।
मगर फिर भी हम यही कहते हैं,
हम  तुमसे बेहतर है।
जिन मानवीय उत्तम गुणो की अमूल्य निधि को उम भूल चुके हो ,
जिन संवेदनाओं को भूलकर तुम संवेदनहीन बन गए हो ,
हम अब भी है संवेदन शील तुमसे अधिक ,
तो तुम्हारा संवेदनाओं पर एकधिकार क्यों ?

एक अंजाना सफर (गजल)

आए ही कब थे अपनी खुशी से हम ,

न ही जाना हो पाएगा अपनी खुशी से ।

क़ज़ा जो आ खड़ी हुई दर पर अपने ,

कैसे रुसवा कर सकते हैं हम भला उसे ?

जिंदगी भर की कमाई है जो हमने की ,

खुल रहे हैं नेकियों-बदियों के हिसाब से।

सामने है नज़रों के अब हमारे सारी जिंदगी ,

तस्वीर दर तस्वीर ज्यों किसी फिल्म जैसे ।

सँजोये जीतने मालो -दौलत ,एशो इशरत ,

रिश्ते -नाते सब अब लग रहे  हैं बेगाने से ।

हमारी तो अब हस्ती ही बिखरे जा रही है 'अनु'

जिस्म खाक हो गया रूह के निकल जाने से ।

अरमानो -खवाइशों की औकात की क्या पुछें ,

मिट गयी सब जिंदगी का चिराग बुझने से ।

यह दुनिया है खूबसूरत धोखे से कमतर नहीं,

एहसास हुआ तब जब मिले नूर ऐ इलाही से ।




 

रविवार, 28 जून 2020

तलाश ( गजल )

                                                       तलाश  ( गजल)
                                       

                              मेरी जिंदगी की हर तलाश अधूरी रह गयी ,
                             जो ख्वाब देखे उनकी ताबीर अधूरी रह गयी।

                             लोग कहते है ढुढ्ने पर खुदा भी मिल जाता है ,
                             ख़ुदा क्या मिलेगा जब उसकी राह ही खो गयी ।

                            मैं तो उन अरमानों को रोयूं ,जो पूरे न हो सके ,
                            अपनी तो आंसुओं  में सारी जिस्त घुल गयी ।

                            छोटी सी मामूली चीज़ तो ढुढ्ने से मिलती नहीं,
                            ऐसे में मंज़िल को खोजूँ जो जाने कहाँ खो गयी !

                            जिंदगी में जाने कितनी कीमती चीज़ें मैने खोयी ,
                            जिनकी यादें मेरे ज़हन में बस कैद होकर रह गयी ।
                           
                           खुशी ,सुख ,आनंद,शांति और मन का चैन खोया ,
                           एक बेचैनी ,तड़प और कशमकश बाक़ी रह गयी ।

                            अब भी तलाश है मुझे उसकी,जिसे जिंदगी कहते हैं,
                            जिसे पाने को कई बार ठोकर खाकर मैं गिर गयी ।

                            कोई हमदर्द भी न मिला किसे हाल -ऐ- दिल कहूँ ? ,
                            तलाश -ए-हमराज़ / हमराह भी अधूरी रह गयी ।

                            अब तो बेशुमार दर्द -ओ -गम ही संभाले बैठी हूँ मैं ,
                            इंतेहा जिनकी इस छोटे से दिल में कोई न रह गयी।

                            
                            'अनु'के जज़्बातों की किताब भी बंद ही रही तमाम उम्र ,
                            कौन समझता ?जो दुनिया के लिए पहेली ही रह गयी।
                            
                           

                           
                            

बुधवार, 10 जून 2020

ममता ( कविता)

                                  




           ममता पर किसी का एकाधिकार नहीं, 
         कौन कहता है पशु का इसपर अधिकार नहीं, 
         भगवान ने तो नहीं बनाया कोई ऐसा प्राणी ,
         जिसके भीतर  भावनाओं का  सागर नहीं । 
        हर माँ का दिल अपनी संतान के लिए तड़पता है,
      फिर वो चाहे मानव हो या पशु ,इससे कोई सरोकार नहीं। 
       प्रसव -पीड़ा की वेदना भी तो समान ही होती है, 
     मानवव माँ को अधिक तो क्या पशु माँ को कम होती है ? 
     नारी गर्भ धारण करती है संतान की लालसा में ,
   तो क्या मादा पशु की संतान की लालसा कम होती है ? 
   नारी की बड़ी सेवा करते गर्भावस्था से संतानउत्पति तक , 
  पशु मादा को भी समान देखभाल और प्यार की ज़रूरत होती है। 
 नारी जितना स्नेह लुटाती , दुलारती है अपने नवजात शिशु को ,
 पशु मादा भी अपनी जिव्ह्या से चाटकर दुलारती है अपने शिशु को । 
  अरे मानवो ! इतनी भी मानवता मत भूलो के दानव बन जाओ ,
  इन भोले ,मासूम , बेज़ुबान प्राणियों के जीवन का सत्कार करो , 
   प्रभु की  अनमोल सरंचना / भेंट समझ इनका सरंक्षण करो । 
   आखिर सर्वभोम ममता की परिभाषा यही है होती।
                         
                       
                         
                        
                        

गुरुवार, 28 मई 2020

कौन नहीं मजदूर यहाँ !! ( गजल)

                                                कौन नहीं मजदूर यहाँ !! ( गजल) 

 

                   कौन नहीं मजदूर यहाँ ,बल्कि हर इंसा है मजदूर यहाँ ,
                  समाज के सभी नौकरी पेशा ,क्या मजदूर से कम यहाँ ?

                  हाँ ! यह अनपढ़ नहीं, गंवार नहीं ,उच्च शिक्षा प्राप्त हैं ,
                  मगर चैन -ओ- सुकूनऔर आराम इन्हें भी नसीब कहाँ !

                 यह बड़ी-बड़ी आला कंपनियों में कार्यरत नौकरी पेशा लोग, 
                 एक खूबसूरत तनख़ाह के लालच पर चूस लिए जाते यहाँ । 

                एक जानवर तक को तो मिलता है आराम ,मगर इन्हें कहाँ !
                सुबह से शाम तक जो कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहते जहां ।

                 मजदूरों पर आँसू बहाना बंद कीजिये,दीजिये थोड़ी तवज्जो , 
                 डॉक्टर्स ,पुलिस कर्मी , सफाई कर्मी और सिपाही भी है यहाँ ।

                करोना के सिपाही के रूप में जो आम जनता की ढाल बने हैं ,
                सिर पर कफन बांधे रहते,अपने जीवन की इन्हे परवाह कहाँ !

                अपने वतन की हिफाज़त में जो सीमा पर डटा रहता है फौजी ,
                ऐसी होंसले,बहादूरी औ वतन परस्तीकी मिसाल  मिलेगी कहाँ ? 

                इन्हें नहीं मिलती सरकार की खास सुविधाये,एक वेतन बस !,
                मगर फिर अपनी सारी जिंदगी को मिटा  देते हैं यह वीर जवां ।

                मजदूर तो वो चालक भी है जो बस ,ट्रक ,रेल आदि चलाते हैं,
                देश की सेवा के लिए पहियों /स्टेरिंग पर गुजरती जिंदगी यहाँ ।

                दिन के 24 घंटे जिनके काम में गुज़र जाते हैं बल्कि तमाम उम्र ,
                परिवार का प्रेम ,खुशी ,सुख ,आनंद इन्हें  कभी मिलता है कहाँ ।

               मजदूर तो वह गृहणी भी है जो सुबह से शाम तक घर संभालती है,
               अपने परिवार की सेवा में इसे कोई इतवार या वेतन मिलता हैं कहाँ । 

               ज़रा सोचिए ,समझिये और दिल पर हाथ रखकर महसूस कीजिये। 
               अपने और अपने परिवार के गुज़र के लिए हर इंसान है मजदूर यहाँ ।  
              
               
 
              
               

               
                
                
               

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

मै हूँ करोना .... ( कविता)

मै  हूँ करोना .... ( कविता)

मै हूँ क़ातिल करोना ,
मुझसे तुम डरो ना!
मेरी राहों में आकर ,
बे मौत भी मरो ना ।
खांसी,जुकाम,बुख़ार ,
उल्टी फिर निमोनियाँ ।
समझकर मामूली रोग ,
इन्हें नज़रअंदाज़ करो ना ।
ये रोग बनाते आसां मेरी राहें ,
इसीलिए अनदेखी करो ना ।
बहुत याराना निभा लिया ,
मगर अब परस्पर दूर रहो ना !
मै हूँ करोना,किसी को नहीं बख़्शता ,
कोई भी धर्म ,जाति ,लिंग या रंग ,
कोई प्रदेश, चाहे दुनिया का कोई भी कोना ।
गरीब -अमीर भी मेरे लिए समान है ,
मुझे मतलब है एक जिस्म से ,
जिसमें मुझे अपना वायरस है पहुंचाना ।
तो हो जाओ खबरदार ,मै किसी का सगा नहीं ,
मै हूँ बेहद खूँखार ,जानलेवा करोना ।



 


बुधवार, 15 अप्रैल 2020

लॉक डाउन का पालन करें ( कविता )


 लॉक डाउन का पालन करें (  कविता )

हाथ जोड़कर करते हैं तुमसे हम प्रार्थना ,
इस मानव-जाति को बचाने की है याचना ।
घर के बाहर बैठा है घात लगाए एक रावण ,
तुम्हें करना ही होगा लक्ष्मण रेखा का पालन ।
ध्यान रहे घर में है जीवन ,और बाहर है मरण ,
घर में रहकर ही जा सकते हो प्रभु की शरण ।
तन से ही दूर हो मगर मन से तो दूर नहीं,
यह बंधन है स्नेह का कोई कारावास तो नहीं ।
फिर क्यों नहीं समझते,क्यों करते हो आनाकानी ? ,
घर से निकलते हो,लोगों से मिलते हो,ये है नादानी ।
भगवान के लिए ! महानुभावों ! यह नादानी न करें ,
स्वस्थ रहें ,जीवित रहे और लॉक-डाउन का पालन करें ।









बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

हैवानियत का रोग ( दिल्ली के दंगाईयों के लिए )

                              
                                               

                           
                                   हैवानियत का रोग ( दिल्ली के दंगाईयों के लिए )

                                 यह क्या रोग लगाया है तुमने जिस्त को अपनी ,
                                 क्या कहें तुम्हें हम कलहपसंद ,क्रोधी या खूनी ।
                                किसके बरलगाने पर तुम बहक हो गए हो इतने ,
                               अपने होश खो बैठे हो ,बन गए हो इस कदर जुनूनी ।
                              इतना भी न समझते हो तूम ,क्या हो गए हो शदाई ,
                              कुछ खुद्गर्जों के मोहरे बनकर कर रहे हो नादानी ।
                              तुम्हारा ही घर है यह ,और तुम्हारे ही अपने लोग ,
                              जिन्हें मिटाकर लिख रहे हो गद्दारी की वही कहानी ।
                              ओ सभ्य समाज में रहने वाले विचार शील प्राणी !!
                              अपनी जोश में होश खोकर मत बर्बाद करो जवानी ।
                              तुम्हें गर कोई बात नापसंद हो आपसी सुलह से सुलझाओ ,
                              मार-काट ,दंगा -फसाद ,तोड़-फोड़ की छोड़ो रीत पुरानी ।
                              'अनु' की गुजारिश है तुमसे मेरे वतन में अमन रहने दो ,
                               बाज़ आ जाओ इस दहशतगर्दी से फौरन तुम अपनी ।
                                 

गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

सुनिए नेताजी ! (हास्य-व्यंग्य कविता)

                         सुनिए नेताजी ! (हास्य-व्यंग्य कविता)




सुनिए नेताजी ! आपको बातें बनाना खूब आता है ,
आवाम को मूर्ख/दीवाना बनाना भी खूब आता है ।
खुद ही लगाकर आग  असंतोष / विरोध की और ,
खुद ही उस आग में और घी डालना खूब आता है।
जबसे आज़ादी मिली देश को क्या हालत सुधार सकी ?
बस खुद की कमियों को दूसरों पर थोपना आता है ।
आप संसद में बैठकर करते क्या है? सब जान गए हम,
मेज-कुर्सियाँ पटकना,हल्ला मचाना ही आपको आता है।
कभी एक दूजे पर आरोप /प्रत्यरोप ,अपशब्द ,कटाक्ष आदि ,
और एक दूसरे के लिए साज़िशों का जाल बिछाना आता है।
देश को कब आपने देश समझा,समझा इसे शतरंज की बिसात ,
और  आवाम को मोहरों की तरह इस्तेमाल करना आता है।
चुनावों के समय '' कैसे है आप '' ,और फिर कहें ''कौन है आप?'
सत्ता के हाथ में आते ही अजनबी बन जाना आपको आता है ।
खुद ही तो पाल रखे है अपने दामनों में अजगर /बिच्छू आपने ,
और करते हैं समाज सुधार की बात, आपको दोगलापन खूब आता है ।
बस अब रहने भी दीजिये और मुंह मत खुलवाईए आप हमारा ,
आपकी कलई  आपकी आवाम के सामने खोलना हमें भी खूब आता है।






गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

यह कैसा फास्ट ट्रैक कानून ? (कविता)

                                   यह कैसा फास्ट ट्रैक कानून ? (कविता)
   
       चींटी की चाल चलता ,
       यह कैसा फास्ट ट्रैक कानून ?
      इंसाफ के लिए भटकते हुए ,
      निकल जाए पीड़ितों की जान ।
      है यह इंसाफ पाने की वही लंबी प्रक्रिया ,
     मगर जाने क्यों नाम रखा ''फास्ट ट्रैक कानून''।

     निर्भया और प्रियंका जैसी कितनी  ही बेटियाँ ,
     हर रोज़ नोची जाती दरिंदों के हाथ इनकी बोटियाँ ,
     तड़प -तड़प के मारी जाएँ या ज़िंदा जला दी जाए ,
     अकर्मण्यता का प्रमाण है ''फास्ट ट्रैक कानून '' ।

     नारी के सम्मान और उसकी जान की परवाह नहीं,
     कुछ भी गुजरे इनपर,सरकार के लब पर आह नहीं,
     आश्वासन की चंद बुंदों से जनता के रोष को शांत कर ,
     पीला दें जबरन  घुट्टी रूपी 'फास्ट ट्रैक कानून'' ।

     कैसी अजीब रिवायत है इस देश की ,परेशान हूँ मै ,
     अपराधियों को शरण देने वाले कानून !तुझसे हैरान हूँ मै ,
     मृत्युदंड के जो अधिकारी ,उन्हें देते हो जीवन -दान ,
     यूं लगे !यह नारीहित के लिए नहीं ,दरिंदों के हित के लिए यह कानून ।

     अगर सरकार की नियत साफ है ,और थोड़ी बहुत ईमानदारी ,
     तो क्यों ना समझे नारी सम्मान /सरंक्षण को अपनी ज़िम्मेदारी ,
     चुन-चुन कर मारे कोढ़े और चढ़ाए फांसीपर इन हैवानो को ,
      बिना वक्त गँवाए सारे सबूत मिलते ही तुरंत करे जो  न्याय ,
      सही मायनों मेँ तभी माना जाएगा ''फास्ट ट्रैक कानून ''